नालंदा / राजगीर। प्राचीन भारत के बौद्धिक गौरव और विश्वस्तरीय ज्ञान-साधना के वैश्विक केंद्र रहे ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda University) के नवनिर्मित अत्याधुनिक अंतरराष्ट्रीय परिसर में त्रिदिवसीय 'वैश्विक ज्ञान महाकुंभ एवं अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन' का भव्य शुभारंभ हुआ। इस ऐतिहासिक समागम में अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, थाईलैंड, श्रीलंका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस सहित दुनिया के 40 से अधिक देशों के 600 से अधिक शीर्ष इतिहासकार, पुरातात्विक वैज्ञानिक, दार्शनिक, राजनयिक और बौद्ध भिक्षु नालंदा पहुंचे हैं। सम्मेलन का मुख्य विषय 'शांति, सह-अस्तित्व और सतत विकास के लिए प्राचीन ज्ञान परंपरा का पुनर्जागरण' रखा गया है।
प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का अद्वितीय संगम
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए विशिष्ट अतिथियों ने स्मरण कराया कि जब विश्व के अधिकांश हिस्सों में शिक्षा की औपचारिक संस्थाएं भी नहीं थीं, तब 5वीं से 12वीं शताब्दी तक नालंदा महाविहार में 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 विश्व-विख्यात आचार्य एक साथ रहकर खगोलशास्त्र, तर्कशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद), गणित, दर्शन और व्याकरण की साधना करते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) और इत्सिंग ने अपने यात्रा वृत्तांतों में नालंदा के विशाल पुस्तकालय 'धर्मगंज' और उसके तीन भव्य भवनों—रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक—की महिमा का वर्णन किया था।
नए नालंदा परिसर की वास्तुकला और नेट-जीरो विशेषताएं
सम्मेलन में आए विदेशी प्रतिनिधियों ने 455 एकड़ में फैले नए विश्वविद्यालय परिसर की वास्तुकला की भूरि-भूरि प्रशंसा की। यह भारत का पहला पूर्णतः 'नेट-जीरो ग्रीन कैंपस' (Net-Zero Green Campus) है:
- प्राचीन तकनीक से प्रेरित कूलिंग: भवनों का निर्माण पारंपरिक मिट्टी की ईंटों और प्राचीन वायु-संचार तकनीक से किया गया है, जिससे भारी गर्मी में भी अंदर का तापमान प्राकृतिक रूप से 5 से 7 डिग्री ठंडा रहता है।
- विशाल जल संचयन: 100 एकड़ में फैले 240 विशाल जल निकाय (Water Bodies) और कमल की झीलें बनाई गई हैं जो विश्वविद्यालय को कभी भी भूजल पर निर्भर नहीं होने देतीं।
- विशाल सोलर फार्म: 6.5 मेगावाट की ऑन-साइट सोलर पावर फैसिलिटी से पूरा परिसर अपनी 100% बिजली आवश्यकता स्वयं उत्पादित करता है।
"नालंदा केवल पत्थरों और ईंटों का विश्वविद्यालय नहीं है, यह इस विचार का नाम है कि ज्ञान की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। आज जब दुनिया युद्ध, जलवायु परिवर्तन और मानसिक तनाव से जूझ रही है, तब नालंदा का 'वसुधैव कुटुंबकम' और मध्यम मार्ग का दर्शन ही मानवता को बचा सकता है।" - कुलाधिपति, नालंदा विश्वविद्यालय
तीन दिनों के दौरान इन विषयों पर होंगे शोध पत्र प्रस्तुत:
- जलवायु परिवर्तन के समाधान में प्राचीन कृषि और जल प्रबंधन ज्ञान।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के युग में मानव चेतना और बौद्ध ध्यान पद्धति का समन्वय।
- सिल्क रूट और नालंदा के ऐतिहासिक व्यापारिक व सांस्कृतिक संबंध।
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