समस्तीपुर / पूसा। वैश्विक जलवायु परिवर्तन, असामान्य मानसूनी बारिश और बढ़ते तापमान की गंभीर चुनौतियों के बीच बिहार के किसानों के लिए डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU), पूसा के वैज्ञानिकों ने ऐतिहासिक कृषि नवाचार किया है। विश्वविद्यालय के पौधा प्रजनन एवं आनुवंशिकी विभाग (Plant Breeding & Genetics) के वैज्ञानिकों के दल ने विगत छह वर्षों के गहन शोध और फील्ड ट्रायल्स के उपरांत गेहूं, मक्का और दलहन की ऐसी तीन क्रांतिकारी 'जलवायु-अनुकूल' (Climate-Resilient) किस्में विकसित की हैं, जो भीषण गर्मी, कम पानी और अचानक आने वाली बेमौसम बारिश में भी 20% से 25% अधिक पैदावार देने में सक्षम हैं। केंद्रीय किस्म विमोचन समिति (CVRC) ने इन किस्मों को वाणिज्यिक खेती के लिए आधिकारिक स्वीकृति प्रदान कर दी है।
1. गेहूं की नई किस्म: 'पूसा राजेंद्र गेहूं-108' (गर्मी सहनशील)
अक्सर मार्च के महीने में अचानक तापमान 35 डिग्री के पार चला जाता है, जिससे गेहूं के दाने समय से पहले सूखकर छोटे और पतले (Terminal Heat Stress) रह जाते हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के रूप में 'पूसा राजेंद्र गेहूं-108' विकसित की गई है:
- तापमान सहने की क्षमता: यह किस्म दाना पकने के समय 38 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को बिना पैदावार घटे आसानी से सहन कर सकती है।
- औसत पैदावार: 55 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
- कम पानी की आवश्यकता: जहां पारंपरिक गेहूं को 5 से 6 बार सिंचाई की जरूरत होती है, वहीं यह किस्म मात्र 3 सिंचाइयों में ही बंपर उत्पादन देती है।
- उच्च पोषण: इसमें प्रोटीन 12.8% और जिंक 42 पीपीएम (PPM) पाया गया है जो कुपोषण से लड़ने में अत्यंत उपयोगी है।
2. मक्के की संकर किस्म: 'राजेंद्र संकर मक्का-5' (जलजमाव प्रतिरोधी)
उत्तर बिहार के कोसी और सीमांचल क्षेत्र में वर्षा ऋतु में अक्सर खेतों में 10 से 15 दिनों तक पानी जमा रहता है जिससे मक्के के पौधे सड़ जाते थे। वैज्ञानिकों ने इस नई किस्म में विशेष 'एरेनकाइमा टिशू' (Aerenchyma tissues) विकसित किए हैं:
- जलभराव में जीवित रहने की शक्ति: खेत में 2 फीट पानी भरा रहने पर भी पौधे की जड़ें 14 दिनों तक सड़ती नहीं हैं और नाइट्रोजन का अवशोषण जारी रखती हैं।
- दाने का वजन और मिठास: भुट्टे लंबे, एक समान दानों से भरे और उच्च स्टार्च युक्त होते हैं, जिससे स्टार्च और एथेनॉल उद्योगों में इसकी भारी मांग रहेगी।
- पकने की अवधि: 105 से 110 दिनों में पककर तैयार।
3. अरहर और मूंग की कम अवधि वाली किस्में
विश्वविद्यालय ने अरहर की 'राजेंद्र अरहर-1' भी जारी की है जो पारंपरिक 9 महीने के बजाय मात्र 150 दिनों में पक जाती है, जिससे किसान इसके तुरंत बाद रबी सीजन में गेहूं या आलू की तीसरी फसल आसानी से ले सकते हैं।
"जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की चेतावनी नहीं बल्कि हमारे खेतों की कड़वी सच्चाई है। हमारे वैज्ञानिकों का ध्येय है कि किसान की लागत घटे, पानी की बचत हो और मौसम के किसी भी उतार-चढ़ाव में उसकी गाढ़ी कमाई सुरक्षित रहे।" - कुलपति, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय
किसानों को बीज वितरण का रोडमैप
कृषि विश्वविद्यालय ने बिहार राज्य बीज निगम और स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। आगामी रबी और खरीफ सत्र में राज्य के सभी 38 जिलों के 1 लाख से अधिक पंजीकृत किसानों को ये प्रमाणित बीज 50% अनुदानित दरों पर सीधे उपलब्ध कराए जाएंगे।
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