कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के रुझान अब लगभग अंतिम नतीजों में तब्दील हो चुके हैं। तृणमूल कांग्रेस 160 सीटों के साथ बहुमत के आंकड़े (148) से काफी आगे निकल चुकी है, जबकि भाजपा 119 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में मजबूती से उभरी है। इस चुनाव में राजनीतिक पंडितों के सभी कयासों को झुठलाते हुए ममता बनर्जी ने साबित किया है कि बंगाल की राजनीति में जमीनी कल्याणकारी योजनाओं का कोई विकल्प नहीं है।
जंगलमहल और दक्षिण बंगाल में टीएमसी की वापसी
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जंगलमहल (झाड़ग्राम, बांकुड़ा, पुरुलिया, पश्चिम मेदिनीपुर) में बड़ी बढ़त बनाई थी, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने इन 40 में से 27 सीटों पर भारी मतों से वापसी की है। तृणमूल द्वारा स्थानीय आदिवासी भाषा ओल चिकी को मान्यता, पट्टा वितरण और राशन आपके द्वार योजनाओं ने ग्रामीणों का दिल जीता।
मतुआ बहुल बनगांव और राणाघाट में क्या हुआ?
सीएए (CAA) लागू होने के बाद भाजपा को नदिया और उत्तर 24 परगना की मतुआ बहुल सीटों पर भारी बढ़त की उम्मीद थी। हालांकि, नागरिकता पोर्टल पर जटिल प्रक्रियाओं और स्थानीय स्तर पर दस्तावेजों की उलझनों के कारण मतुआ समुदाय का एक बड़ा हिस्सा तटस्थ रहा या टीएमसी के पक्ष में मतदान किया।
"बंगाल को बाहरी ताकतों ने पैसे और एजेंसियों के दम पर कब्जाने की कोशिश की, लेकिन बंगाल की माताओं-बहनों ने अपनी दीदी पर अटूट भरोसा जताया है।" - अभिषेक बनर्जी, तृणमूल महासचिव
💬 पाठकों की प्रतिक्रियाएं (0)
सभ्य और मर्यादित टिप्पणियों का स्वागत हैअभी इस खबर पर कोई टिप्पणी नहीं है। सबसे पहले अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करें!